रायपुर : संस्कृति विभाग, पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय के तत्वावधान में “विरासत का प्रवाह: नैतिकता, संरक्षण और समुदाय” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। कार्यक्रम में देशभर से आए विशेषज्ञों, विद्वानों, शोधकर्ताओं और प्रतिभागियों ने विरासत संरक्षण में नैतिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रामाणिकता और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के महत्व पर चर्चा की।
पुरातत्त्ववेत्ता प्रभात कुमार सिंह ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि विरासत केवल अतीत की स्मृतियों और पुरावशेषों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक पहचान, ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता का आधार है। उन्होंने विरासत के मूल स्वरूप, ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक महत्व को समझते हुए संरक्षण की प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी को जरूरी बताया।
मुख्य अतिथि प्रो. ऋचा कम्बोज, नई दिल्ली ने विरासत संरक्षण में शोध, ज्ञान और व्यवहारिक प्रयासों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। विशिष्ट अतिथि ओजस हिरानी, गुजरात और टोप लाल शर्मा, छत्तीसगढ़ ने भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि विरासत संरक्षण को प्रभावी और स्थायी बनाने के लिए अकादमिक संस्थाओं, शासन और स्थानीय समुदायों के बीच समन्वय आवश्यक है।
साहित्य अकादमी छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने इतिहास लेखन में तथ्य, तर्क और नैतिकता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इतिहास और विरासत से जुड़े विषयों को प्रमाणिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझना जरूरी है। भ्रामक और तथ्यहीन आख्यानों से बचते हुए इतिहास को सही संदर्भ और प्रमाणिकता के साथ भावी पीढ़ियों तक पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग के संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने की। उन्होंने विरासत संरक्षण को वर्तमान और भावी पीढ़ियों के प्रति सामूहिक दायित्व बताते हुए कहा कि संरक्षण में नैतिकता, प्रामाणिकता, वैज्ञानिक पद्धति और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को समान महत्व दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय संगोष्ठी सह प्रशिक्षण कार्यक्रम में विरासत संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं द्वारा अपने अनुभव साझा किए जा रहे हैं। साथ ही प्रतिभागियों को संरक्षण की आधुनिक एवं वैज्ञानिक पद्धतियों से परिचित कराया जा रहा है। कार्यक्रम का उद्देश्य विरासत संरक्षण को केवल शासकीय दायित्व तक सीमित न रखकर समाज और स्थानीय समुदायों की साझा जिम्मेदारी के रूप में विकसित करना है।