रायपुर: छत्तीसगढ़ शासन ने प्रदेश में धान की खेती के क्षेत्रफल का सटीक, पारदर्शी और तकनीक-आधारित आकलन करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। मंत्रालय महानदी भवन में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण संचालनालय और छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
यह समझौता सैटेलाइट-आधारित मैपिंग, डिजिटल क्रॉप सर्वे और भू-स्थानिक (Geo-spatial) डेटा के बेहतर समन्वय के माध्यम से राज्य की धान उपार्जन व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी एवं सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से किया गया है।
एमओयू के प्रमुख बिंदु और तकनीकी विशेषताएं
गैर-जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों की मैपिंग: विशेष रूप से वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत आबंटित भू-भागों और डुबान क्षेत्रों में स्थित कृषि क्षेत्रों की पहचान कर उनकी जीआईएस (GIS) आधारित पॉलीगॉन लेयर तैयार की जाएगी, जो वर्तमान में डिजिटल रूप से मैप नहीं हैं।
खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 के लिए आकलन: तैयार पॉलीगॉन लेयर और भू-स्थानिक डेटा के आधार पर आगामी खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 में धान की फसल के वास्तविक रकबे का बिल्कुल सटीक आकलन किया जा सकेगा।
सैटेलाइट इमेजरी से सत्यापन: अन्य जियो-रेफरेंस्ड क्षेत्रों में भूमि खंडों (खसरों) के अक्षांश-देशांतर का सैटेलाइट इमेजरी से मिलान कर धान की फसल की डिजिटल उपस्थिति की पुष्टि की जाएगी।
मजबूत डिजिटल ढांचा: इस तकनीकी पहल से दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों की कृषि भूमि की डिजिटल पहचान मजबूत होगी तथा भविष्य के डिजिटल क्रॉप सर्वे के लिए एक ठोस आधार ढांचा तैयार होगा।
इस अवसर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा, खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग की सचिव रीना बाबा साहेब कंगाले, विभाग की संचालक डॉ. फरिहा आलम और छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के संचालक कवीश्वर उपस्थित रहे।