रायपुर,  छत्तीसगढ़ के पूर्व नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में लंबे इंतजार के बाद अब स्कूलों में फिर से घंटियां बजने लगी हैं। जहां कभी बंदूक और बारूद का खौफ था, वहां अब बच्चों की आवाज, राष्ट्रगान और किताबों की दुनिया नजर आ रही है। इस शिक्षक दिवस पर बस्तर और आसपास के इलाकों में यह बदलाव शांति, सुरक्षा और शिक्षा की नई उम्मीद का प्रतीक बनकर सामने आया है।

600 से अधिक स्कूल फिर हुए शुरू

राज्य सरकार की पुनर्वास, सुरक्षा और जनकल्याणकारी योजनाओं के असर से बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे जिलों में करीब दो से ढाई दशक से बंद 600 से अधिक प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल दोबारा संचालित किए गए हैं। प्रशासन और सुरक्षा बलों के सहयोग से स्कूल भवनों को फिर तैयार कर बच्चों के अनुकूल बनाया जा रहा है।

शिक्षक बने शिक्षा की नई रोशनी

इन क्षेत्रों में स्थानीय शिक्षकों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है। शिक्षक बच्चों से गोंडी, हल्बी और डोरली जैसी स्थानीय बोलियों में संवाद कर रहे हैं और अभिभावकों का भरोसा जीतकर बच्चों को दोबारा स्कूल तक ला रहे हैं। स्थानीय शिक्षित युवाओं को भी ‘शिक्षा दूत’ के रूप में जोड़ा गया है।

स्मार्ट क्लास से लेकर खेलकूद तक सुविधाएं

दोबारा शुरू हुए स्कूलों में अब शिक्षा के साथ आधुनिक सुविधाओं पर भी जोर दिया जा रहा है। कई स्कूलों में स्मार्ट क्लास, टैबलेट और डिजिटल कंटेंट के जरिए पढ़ाई कराई जा रही है। बच्चों को खेल सामग्री और ‘न्योता भोजन’ जैसी सुविधाएं भी मिल रही हैं।

‘नियद नेल्ला नार’ योजना के तहत सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने से शिक्षक भी अब बिना भय के नियमित रूप से स्कूल पहुंच पा रहे हैं।

स्कूल की घंटी बनी बदलाव की पहचान

इस शिक्षक दिवस पर नक्सलमुक्त क्षेत्रों में काम कर रहे शिक्षक किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं। वर्षों तक बंद रहे स्कूलों में जब फिर घंटी बजती है और बच्चे किताब लेकर कक्षा में बैठते हैं, तो यह केवल शिक्षा की वापसी नहीं, बल्कि शांति, सुरक्षा और विकास की नई शुरुआत का संकेत है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *