रायपुर : छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग द्वारा भारतीय शास्त्रीय कला परंपरा और वर्षा ऋतु के सौंदर्य को समर्पित ‘पावस प्रसंग’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में कलाकारों ने शास्त्रीय नृत्य, संगीत और भावाभिव्यक्ति के माध्यम से पावस ऋतु के विविध रंगों, प्रकृति के उल्लास और मानवीय संवेदनाओं को मंच पर साकार किया।

कार्यक्रम में राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा ने वर्षा ऋतु की विशेषताओं को अभिव्यक्त करती सुमित्रानंदन पंत की कविता का भावपूर्ण पाठ किया। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में वर्षा का कृषि और जनजीवन से गहरा संबंध है। वर्षा प्रकृति को नवजीवन देने के साथ हरियाली और कृषि समृद्धि का आधार भी है।

शास्त्रीय गायन और नृत्य ने बांधा समां

‘पावस प्रसंग’ में आराध्या कुमारी सिंह ने शास्त्रीय गायन की प्रस्तुति से पावस के भावों को सुरों में पिरोया। ताक्षवी गौतम ने ओडिसी नृत्य के जरिए वर्षा ऋतु और प्रकृति के सौंदर्य को भाव-भंगिमाओं में प्रस्तुत किया।

वहीं तरुण शर्मा एवं साथी कलाकारों ने कथक की प्रस्तुति से ताल, लय और भाव का सुंदर समन्वय दिखाया। आँचल पांडेय की ओडिसी प्रस्तुति ने भी दर्शकों की खूब सराहना बटोरी।

कलाकारों को मिला मंच और प्रोत्साहन

‘पावस प्रसंग’ के जरिए शास्त्रीय कला परंपरा के संरक्षण और कलाकारों को मंच उपलब्ध कराने की दिशा में भी पहल की गई। कार्यक्रम में कलाकारों ने अपनी साधना और प्रतिभा का प्रदर्शन किया। साथ ही भारतीय संस्कृति में प्रकृति और ऋतुओं के महत्व को भी रेखांकित किया गया।

संस्कृति संचालक ने किया कलाकारों का उत्साहवर्धन

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्कृति विभाग के संचालक डॉ. संजय कनौजे की उपस्थिति में हुआ। उन्होंने कहा कि ‘पावस प्रसंग’ छत्तीसगढ़ के कलाकारों को प्रोत्साहित करने और उन्हें अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने का महत्वपूर्ण मंच है।

उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य एवं संगीत की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए ऐसे सांस्कृतिक आयोजन जरूरी हैं। उन्होंने कला प्रेमियों और आम नागरिकों से कलाकारों का उत्साहवर्धन करने का आग्रह किया।

कार्यक्रम में उप संचालक उमेश मिश्रा, उदय सिंह चौहान, वरिष्ठ साहित्यकार अरविंद मिश्रा, वरिष्ठ पत्रकार दीपेंद्र दीवान, वरिष्ठ कलाकार रिखी क्षत्रिय एवं विजय मिश्रा सहित कला और साहित्य जगत से जुड़े गणमान्यजन उपस्थित रहे।

‘पावस प्रसंग’ में शास्त्रीय गायन की मधुरता, ओडिसी की भावपूर्ण भंगिमाओं और कथक की ताल-लय ने मिलकर वर्षा ऋतु को संगीत, नृत्य, साहित्य और संवेदना के उत्सव के रूप में प्रस्तुत किया।

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