रायपुर। जशपुर में जंगलों से मिलने वाला महुआ अब पारंपरिक वन उपज तक सीमित नहीं है। इसे आधुनिक खाद्य उत्पादों के रूप में तैयार कर बाजार तक पहुंचाने की दिशा में काम हो रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की पहल के तहत स्थानीय संसाधनों के मूल्य संवर्धन पर जोर दिया जा रहा है। इससे जनजातीय परिवारों और महिला स्वसहायता समूहों के लिए आय के नए अवसर तैयार होने की संभावना है।

रायपुर के साइंस कॉलेज ग्राउंड में आयोजित 14वें इंडिया इंडस्ट्रियल फेयर में जशप्योर और जय जंगल के स्टॉल पर जशपुर के महुआ से तैयार उत्पाद प्रदर्शित किए गए। यहां महुआ नेक्टर, महुआ टी, महुआ कुकीज, महुआ लड्डू, महुआ एनर्जी पाचक, रागी-महुआ उत्पाद और फूड-ग्रेड महुआ फूल जैसे उत्पाद लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे।

महुआ को बाजार के अनुरूप तैयार करने के लिए संग्रहण से लेकर प्रसंस्करण और पैकेजिंग तक की प्रक्रिया पर काम किया जा रहा है। स्वच्छ और फूड-ग्रेड संग्रहण, डिहाइड्रेशन, उत्पाद विकास और बेहतर पैकेजिंग के जरिए महुआ की गुणवत्ता और बाजार मूल्य बढ़ाने की कोशिश है।

जिला प्रशासन के सहयोग से संचालित Mahua Centre of Excellence और Mahua Kosh में महुआ के खाद्य उपयोग, प्रसंस्करण और नए उत्पादों को लेकर प्रयोग किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य स्थानीय वन उपज को स्थानीय स्तर पर ही अधिक मूल्यवान बनाना और उससे जुड़े लोगों को आर्थिक लाभ पहुंचाना है।

इंडस्ट्रियल फेयर में जशप्योर और जय जंगल के स्टॉल का प्रतिनिधित्व जशपुर की अनेश्वरी भगत और गणपति बाई ने किया। उन्होंने लोगों को महुआ के उत्पादों के साथ इसके संग्रहण और प्रसंस्करण की जानकारी भी दी। इस पहल में पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक फूड प्रोसेसिंग और बाजार की जरूरतों से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।

जशपुर का महुआ अब जंगल से निकलकर बाजार की नई पहचान बना रहा है। स्थानीय संसाधन, जनजातीय परंपरा, महिला समूहों की भागीदारी और आधुनिक तकनीक के मेल से महुआ को बड़े बाजार तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। इससे वन उपज से जुड़े परिवारों के लिए आजीविका के नए रास्ते खुलने की उम्मीद है।

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