रायपुर,  छत्तीसगढ़ में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से निकलने वाले उपचारित पानी को दोबारा उपयोग में लाने की तैयारी शुरू हो गई है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने नगरीय निकायों को ऐसे संभावित उपयोगकर्ताओं की पहचान करने के निर्देश दिए हैं, जिन्हें एसटीपी से मिलने वाले उपचारित पानी की जरूरत हो सकती है। इसके लिए एसटीपी से 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले उद्योगों, थर्मल पावर प्लांट, रेलवे, सरकारी विभागों और अन्य संस्थानों से संपर्क किया जाएगा।

राज्य शहरी विकास अभिकरण (सूडा) ने इस संबंध में छह नगर निगमों के आयुक्तों को परिपत्र जारी किया है। इन निकायों से संभावित उपयोगकर्ताओं की सूची तैयार करने के साथ यह भी पता लगाने को कहा गया है कि संबंधित संस्थानों को कितनी मात्रा में पानी की जरूरत है। निकायों को यह जानकारी 15 दिनों के भीतर उपलब्ध करानी होगी।

50 किमी के दायरे में होगी तलाश

उपचारित पानी के इस्तेमाल के लिए एसटीपी के आसपास के क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जा रही है। निकाय थर्मल पावर प्लांट, उद्योग, रेलवे और दूसरे सरकारी या निजी संस्थानों से संपर्क कर उनकी पानी की जरूरत का आकलन करेंगे। इससे एसटीपी शुरू होने के बाद उपचारित पानी के उपयोग के लिए पहले से संभावित उपभोक्ता उपलब्ध रहेंगे।

स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) 2.0 और मिशन अमृत 2.0 के तहत प्रदेश के छह नगर निगमों में कुल 338 एमएलडी क्षमता के एसटीपी बनाए जा रहे हैं। इनमें बीरगांव में 55 एमएलडी, भिलाई-चरौदा में 13 एमएलडी, भिलाई में 150 एमएलडी, दुर्ग में 47 एमएलडी, अंबिकापुर में 32 एमएलडी और राजनांदगांव में 41 एमएलडी क्षमता के प्लांट शामिल हैं।

ऊर्जा विभाग और एनजीटी के निर्देशों के अनुरूप पहल

सूडा के मुताबिक, भारत सरकार की टैरिफ पॉलिसी 2016 के तहत एसटीपी के 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित थर्मल पावर प्लांटों में उपचारित जल के पुन: उपयोग को बढ़ावा देने के निर्देश हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की ओर से भी एसटीपी के उपचारित पानी के दोबारा इस्तेमाल को लेकर निर्देश दिए गए हैं। इसी दिशा में राज्य में संभावित उपयोगकर्ताओं की पहचान का काम शुरू किया गया है।

दुर्ग, भिलाई, भिलाई-चरौदा, बीरगांव, अंबिकापुर और राजनांदगांव नगर निगमों को 15 दिनों में जानकारी जुटाकर देने को कहा गया है। इसका उद्देश्य एसटीपी का संचालन शुरू होने के बाद उपचारित पानी को बेकार जाने से रोकना और जरूरत वाले संस्थानों में उसका उपयोग सुनिश्चित करना है।

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