संजय शर्मा
एडिटर इन चीफ
उज्जैन में लगने वाले पिछली सदी के अंतिम सिंहस्थ कुंभ के मौके पर 1992 में पहली बार मुझे प्रयागराज जाने का मौका मिला था। उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर भव्य सिंहस्थ कुंभ मेला लगा था और मैं उस समय लखनऊ से बस से प्रयागराज पहुंचा था। मन कर रहा था कि गंगा जी में डुबकी तो लगा लो… वहां काफी भीड़ भी दिख रही थी…पर ट्रेन कहीं छूट न जाए इसी चिंता में था। मैं प्रयागराज में दोपहर करीब साढ़े 12 बजे पहुंचा था और शायद ढाई या तीन बजे गाड़ी थी। गंगा स्नान को चले गए तो कहीं देर न हो जाए…और मेरी उम्र भी कम थी अभी अभी पढ़ाई खत्म करके नौकरी पर आया था। पर देखो किस्मत का हाल मैं स्टेशन के अंदर बैठा रहा, गाड़ी धीरे धीरे लेट होती गई वो। एक बार में नहीं बता रहे थे कि कब आएगी। बस आधे घंटे देरी बताते और मैं कहीं जा भी नहीं पाता…आखिर रात में करीब दस बजे गाड़ी आई…। तब से अफसोस था कि कुंभ स्नान नहीं हो पाया। भविष्य में जरूर कुंभ में आऊंगा कहकर मैने प्रयागराज से विदाई ली। फिर तो कई बार वहां गया पर कुंभ में जाने का मौका पहली बार इस महाकुंभ में लगा।
मैं कुंभ में जाने के लिए परिवार के अन्य सदस्यों के साथ रायपुर से दोपहर में कार से निकला और रातभर चलकर हम सुबह करीब दस बजे प्रयागराज पहुंचे….कुंभ का उत्साह सारे रास्ते नजर आ रहा था..लोग बहुत उत्साहित दिख रहे थे और रास्ते भर जहां भी दूकानों में कुछ लेने या चाय आदि के लिए किसी रेस्टारेंट में रूके तो उन दुकानदारों या रेस्टारेंट वालों के भीतर भी बहुत अलग फीलिंग दिख रही थी…। वे मेहमानों का स्वागत करने के लिए उत्सुक थे बहुत आनंदित दिख रहे थे सेवा भाव के साथ लगे थे…। और फिर ट्रैफिक जाम की स्थिति इतनी भारी थी कि सुबह करीब दस बजे शहर में घुसने के बाद नदी के पास वाली पार्किंग तक पहुंचने में करीब दो घंटे लग गए। और फिर जो दिखा है वह भारत के सनातन की ताकत की गवाही देता नजर आया। वहां का नजारा देख सचमुच मैं हैरान था। हैरान इस बात पर कि देश के नेता सनातन समाज में फूट डालकर राज करना चाहते हैं पर इतने विशाल सनातन समाज को एक साथ रखकर उसका समर्थन क्यों नहीं लेते। पर चुनाव जैसी बातें अलग थीं और कुँभ स्थल पर जो देख रहा था वह बिलकुल अलग था। हर वर्ग, समाज, जाति का उत्साह वहां दिख रहा है। सभी बस एक धारा में नदी की तरह बहे जा रहे थे। एक दिशा, एक धारा, एक लक्ष्य और एक पर्व। हम नाव लेकर संगम तक गए और वहां स्नान किया। कहीं कोई भेदभाव नहीं, कोई ऊंच नीच नहीं, आगे पीछे नहीं… बस भारतीय सनातनी ही वहां मौजूद थे।
मैं पत्रकार की तरह चीजों को देख रहा था आने वाले महीनों में दिल्ली, बिहार, असम, और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनाव होने वाले थे और सनातनियों का यह सैलाब मुझे साफ बता रहा था कि चुनाव की दिशा किस तरफ होगी और नतीजे क्या होंगे। पूरे समय मैं हैरान होता रहा कि क्या यह सब देश के उन राजनीतिक दलों को नहीं दिखता है जो सनातन की उपेक्षा करने में सफलता देखते हैं, या फिर सनातन समाज को टुकड़ों में देखना चाहते हैं। वे सभी दल क्यों नहीं इस पूरे समाज को अपने साथ लाने का प्रयास करते यही सोचता रहा। वैसे यह भी स्पष्ट कर दूं कि सनातन की बात करते समय मेरे भीतर जरा भी यह भाव नहीं कि किसी और समाज को पीछे छोड़ दिया जाए, बल्कि सबके साथ सनातन को भी शामिल करने में क्या हर्ज है…..?
अब पत्रकार ठहरे तो दुनियां की राजनीति का भी ख्याल आया…जियो पोलिटिक्स तो भारत में सनातन को अपने हित में नहीं मानता। वह इसे हिन्दुत्व का उभार समझता है और विश्व राजनीति में दबदबा रखने वाले समुदाय को जाहिर है यह पसंद नहीं। अब भीतर का पत्रकार सवाल पूछता है कि क्या विश्व की राजनीति के खिलाड़ी भारतीय राजनीतिक दलों को किसी तरह अपने प्रभाव में लेकर काम कर रहे हैं….लगता तो ऐसा ही है….।
अब 35 सालों की पत्रकारिता में इतनी तो समझ आ ही चुकी है कि जनमानस क्या चाहता है और ऊंट किस करवट बैठेगा पहले से पता चल जाए। और मैं नहीं मानता कि राजनीतिक दलों को इसका अहसास नहीं है, तो फिर वे क्यों सनातन के खिलाफ लगे रहते हैं? मुझे लगता है उनको विश्व के खिलाड़ियों से “हारने के लिए ही” सहायता दी जा रही है। खिलाड़ी सोचते हैं – “लगे रहो कभी तो सनातन टूटेगा। और तुम अगर सनातन विरोध के कारण सत्ता नहीं पाओगे तो बदले में बड़ा ईनाम हम देते रहेंगे।”
यह मैने भीतर सोचा शायद ऐसा हो …नहीं पता यह सोचना कितना ठीक है, पर कुंभ को देखकर एक बात तो पक्की समझ आ गई कि जिन्होंने हजार सालों तक हमले के बाद भी सनातन का ” स ” तक मिटाने में सफलता नहीं पाई वह अगले हजार साल फिर कोशिश ही कर पाएंगे। और पुराने राजनीतिक दल इस साफ साफ लिखे संदेश को नहीं समझ सके तो आने वाले दस सालों में मैं नए खिलाड़ियों का उदय देख रहा हूं, जो सनातन को कम से कम उपेक्षित तो नहीं करना चाहेंगे। इस कुंभ में रिपोर्टिंग करने, वीडियो बनाने और जाने क्या क्या करने का सोचकर गया था। मेरे पास एक ही दिन था, पर वहां जो हुआ उसमें सारी चीजें भूल गया और मैं तो सिर्फ उस करंट को, उस धारा को देखता, उस ऊर्जा को महसूस करता रह गया जो वहां प्रयागराज के आसपास बह रही थी और जो कुछ ही समय में पूरे देश पर छा जाने वाली है।