संजय शर्मा
एडिटर इन चीफ-
पाकिस्तान में अब अलग सिंधी देश या सिंधु राष्ट्र बनाने की मांग को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन और ऑनलाइन अभियान तेज़ हो गए हैं। अगर ताज़ा घटनाक्रम देखें, तो वहाँ विरोध काफ़ी तेज़ है। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान की सरकार देश में कई नए राज्य बनाने की तैयारी में है और इसी कड़ी में सिंध को भी चार से पांच हिस्सों में बांट दिया जाएगा। चर्चा है कि सिंध को बाँटने के बाद उसकी पहचान पूरी तरह खत्म हो जाएगी। पूर्वी सिंध या पश्चिमी सिंध जैसे नाम दिए जाएंगे। इससे वहां के प्राचीन और सदियों पुराने स्थानों के नाम और उनकी पहचान खत्म होने की आशंका पैदा हो गई है। सिंध के बंटवारे के या नए प्रशासनिक ढाँचे की चर्चाओं ने सूबे में ज़बरदस्त प्रतिक्रिया पैदा की है। हालांकि सिंधियों के भारी विरोध को देखते हुए सिंध विधानसभा ने हाल ही में प्रस्ताव पास करके कहा कि “सिंध एक है,” और किसी भी बँटवारे को नामंज़ूर किया जाएगा। वहां सत्तारूढ़ पीपीपी और कई राष्ट्रवादी समूह इसे सिंधी पहचान पर सीधा हमला बता रहे हैं। दूसरी तरफ फौज से ताकत पाने वाले कुछ दल इसे प्रशासनिक सुधार कहकर बचाव भी कर रहे हैं।
वैसे प्रदेश को बांटने का कोई अंतिम प्रशासनिक फैसला अब तक लागू नहीं हुआ है। लेकिन माहौल ने अलग सिंधु देश की मांग को एक तरह से नई ऊर्जा दे दी है। सिंधुदेश की मांग लंबे समय से मौजूद है, लेकिन प्रांतीय बँटवारे की चर्चा ने पहचान और संसाधनों को लेकर जो चिंता है, उसे फिर से आगे ला दिया है। दिलचस्प बात यह है कि सिंध विधानसभा में ज़्यादातर दल सिंध के बँटवारे के भी खिलाफ़ हैं और सिंधुदेश की अलगाववादी मांग के भी खिलाफ़ हैं। यानी वो दोनों पक्षों को खुश रखने की कोशिश में लगे हैं।
इस वक़्त मुद्दा एक ही है- सिंध की पहचान। पानी, ज़मीन, भाषा, और संसाधनों का सवाल, बार बार इसी बहस को हवा देता है कि अलग सिंधु देश बनाया जाए। वैसे यह भी बता दें कि पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियां ऐसे आंदोलनों को बहुत कड़ाई से कुचलती रही हैं। फ़िलहाल व्यापक जनविद्रोह जैसी स्थिति नहीं है, पर यह मुद्दा पहले के मुकाबले ज़्यादा चर्चा में ज़रूर है। और अगर प्रशासनिक पुनर्गठन जैसी कोई नई पहल हुई, तो यह विरोध आगे चलकर विद्रोह में बदल सकता है। यानी सिंध की सियासत इस वक़्त दो मोर्चों पर चल रही है- पहचान की लड़ाई और राजनीतिक भविष्य को लेकर असमंजस।
इसके जवाब में पाकिस्तान के भीतर भी कड़ी प्रतिक्रियाएँ आई हैं। लेकिन विश्लेषकों के हिसाब से अभी भी इसे पूरे सिंध का व्यापक जन आंदोलन नहीं कहा जा सकता। पाकिस्तान की सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती अभी भी बलूचिस्तान और केपीके ( खैबर पख्तूनख्वा ) प्रांत जैसे मसलों से ही जुड़ी है। सिंधी अहिंसक आंदोलन कर रहे हैं तो तनाव बढ़ा है, पर यहां वैसी गड़बड़ी नहीं फैली है जैसी बलूचिस्तान या केपीके में ।
असल में सिंध की सियासत में पानी का मुद्दा भी हमेशा से सबसे संवेदनशील रहा है। सिंधु नदी के जल बंटवारे पर जब भी विवाद उठता है, तो स्थानीय किसान, और राजनीतिक समूह दोनों मुखर हो जाते हैं। इसी तरह भूमि और बाहरी आबादी के बसने को लेकर भी असंतोष की झलक मिलती है। भाषा और संस्कृति का सवाल भी कम बड़ा नहीं है। सिंधी भाषा को पर्याप्त सम्मान न मिलने की शिकायत भी समय-समय पर सुनाई देती है। इन्हीं सब मुद्दों पर राष्ट्रवादी राजनीति आगे बढ़ रही है। इधर भारत ने सिंधुदेश की मांग का कभी आधिकारिक समर्थन नहीं किया है। भारत की आधिकारिक नीति ज़्यादातर क्षेत्रीय स्थिरता, सीमा-पार आतंकवाद और द्विपक्षीय संबंधों पर केंद्रित रही है।
ऐसे में यहाँ एक सवाल उठता है। पाकिस्तान दशकों से भारत के जम्मू-कश्मीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बयान देता रहा है और अलगाववादी तत्वों का समर्थन भी करता रहा है, जिस पर भारत लगातार सीमा-पार आतंकवाद का आरोप लगाता है। ऐसे में हमारा मानना है कि भारत को कम से कम कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर सिंध सहित पाकिस्तान के उन क्षेत्रों में समर्थन देना चाहिए जहाँ लोकतांत्रिक और मानवाधिकार संबंधी चिंताएं उठती हैं। सिंध की आजादी का समर्थन भारत के भीतर भी संगठनों, आम लोगों और मीडिया को करना चाहिए।
