संजय शर्मा

एडिटर इन चीफ

 

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर 15 फरवरी 2025 की रात जो हुआ, उसे सिर्फ एक हादसा मानकर भूल जाना शायद सबसे आसान रास्ता है। महाकुंभ जाने वाले यात्रियों की भारी भीड़ थी। प्रयागराज की ओर जाने वाली ट्रेनों में बैठने के लिए लोग स्टेशन पहुंचे थे और इसी भीड़ के बीच भगदड़ मच गई। 18 लोगों की जान चली गई और 15 लोग घायल हुए। बाद में जांच बैठी, व्यवस्थाएं बदली गईं, विशेष ट्रेनों के लिए अलग इंतजाम किए गए। यह सब जरूरी था। लेकिन मेरे मन में सवाल दूसरा है। क्या समस्या सिर्फ उस एक रात की थी? क्या हम एक ऐसे देश में नहीं रह रहे हैं जहां लोगों की संख्या, उनकी यात्राएं और बड़े आयोजनों में उनकी भागीदारी बहुत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन हमारा परिवहन तंत्र अभी भी कई जगह उस बढ़ती भीड़ के हिसाब से तैयार नहीं है?

महाकुंभ तो फिर भी पहले से घोषित आयोजन था। सरकार को पता था कि करोड़ों लोग आएंगे। रेलवे को पता था, राज्य सरकार को पता था, पुलिस को पता था। उसके बावजूद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जो हुआ उसने एक बड़ा सवाल छोड़ दिया। और यह सवाल सिर्फ कुंभ का नहीं है। कल किसी शहर में बहुत बड़ी राजनीतिक रैली हो सकती है। लाखों लोग एक साथ पहुंच सकते हैं। किसी धार्मिक आयोजन में अचानक अनुमान से कई गुना अधिक श्रद्धालु पहुंच सकते हैं। रेलवे की किसी बड़ी भर्ती परीक्षा में लाखों युवा एक-दो दिन के भीतर कुछ शहरों की तरफ निकल सकते हैं। किसी राज्य में पुलिस भर्ती हो, शिक्षक भर्ती हो या कोई दूसरी बड़ी प्रतियोगी परीक्षा हो—स्टेशन और बस अड्डों पर आपने युवाओं की भीड़ देखी ही होगी। और वह भीड़ कई बार तनाव भी पैदा करती है।  तब सवाल है कि क्या हमारे पास भीड़ आने के बाद उसे संभालने की योजना है या भीड़ आने से पहले ही उसे नियंत्रित करने की व्यवस्था? दोनों बातों में बड़ा अंतर है। मुझे लगता है कि हमारे यहां समस्या कई बार तब शुरू होती है जब हम भीड़ को केवल संख्या समझते हैं। रेलवे कहता है इतने लाख यात्री आए। प्रशासन कहता है इतने हजार पुलिसकर्मी लगाए। इतने स्पेशल ट्रेन चला दिए। लेकिन उस भीड़ के भीतर हर व्यक्ति की अपनी चिंता है। किसी को ट्रेन पकड़नी है, किसी को परीक्षा में समय पर पहुंचना है, किसी के साथ छोटा बच्चा है, किसी के साथ बुजुर्ग मां-बाप हैं। कोई पहली बार दिल्ली आया है । भीड़ अपने आप भगदड़ नहीं बनती। जब हजारों लोगों को एक ही समय पर एक संकरे रास्ते से जाना पड़े, जब लोगों को यह साफ न हो कि ट्रेन किस प्लेटफॉर्म पर आएगी, जब एक तरफ से लोग आ रहे हों और उसी रास्ते से दूसरी तरफ के लोग निकल रहे हों, जब कोई सूचना या अफवाह अचानक लोगों की दिशा बदल दे, तब कुछ मिनटों में सामान्य दिखने वाली भीड़ खतरनाक हो सकती है। नई दिल्ली की घटना के बाद रेलवे ने प्रयागराज जाने वाली विशेष ट्रेनों को जहां तक संभव हो प्लेटफॉर्म 16 से चलाने, अतिरिक्त RPF और GRP लगाने और यात्रियों के प्रवेश को व्यवस्थित करने जैसे कदम उठाए। बाद में रेलवे ने बड़े स्टेशनों पर भीड़ के समय वार रूम, बेहतर संचार व्यवस्था और स्टेशन की क्षमता के अनुसार टिकट बिक्री नियंत्रित करने जैसे उपायों की भी बात की। यानी समस्या पहचानी गई।

लेकिन मेरा सवाल है कि ऐसी व्यवस्था हादसे के बाद क्यों? हमारे देश में अब किसी बड़े आयोजन में लाखों लोगों का पहुंचना असामान्य बात नहीं है। भारत की आबादी और लोगों की आर्थिक क्षमता दोनों बढ़ी हैं। लोग पहले की तुलना में ज्यादा यात्रा कर रहे हैं। धार्मिक पर्यटन बढ़ा है। सड़कें अच्छी हुई हैं। ट्रेनें बढ़ी हैं। मोबाइल और सोशल मीडिया के कारण किसी आयोजन की जानकारी कुछ घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच जाती है। इसलिए अब हमें शायद परिवहन की योजना भी पुराने हिसाब से नहीं बल्कि नए सिरे से बनानी चाहिए। मान लीजिए किसी शहर में दस लाख अतिरिक्त लोग पहुंचने वाले हैं तो यह केवल रेलवे का मामला नहीं है। रेलवे स्टेशन के बाहर आते ही वह भीड़ शहर की सड़क पर आ जाएगी। वहां से बस, ऑटो, टैक्सी और निजी गाड़ियों में बंटेगी। फिर वही लोग वापस भी जाएंगे। यानी रेलवे, बस सेवा, ट्रैफिक पुलिस, स्थानीय प्रशासन और आयोजन करने वाली संस्था—सभी को एक ही योजना का हिस्सा होना चाहिए। और टेक्नोलॉजी के इस दौर में यह बहुत मुश्किल भी नहीं लगता। जब रेलवे को पता है कि कितने आरक्षित टिकट बिके हैं, कितने अनारक्षित टिकट बिक रहे हैं और किस दिशा में अचानक यात्रियों की संख्या बढ़ रही है तो क्या किसी स्टेशन पर भीड़ खतरनाक स्तर तक पहुंचने से पहले अलर्ट नहीं दिया जा सकता?  क्या मोबाइल पर यात्रियों को पहले ही नहीं बताया जा सकता कि स्टेशन पर बहुत अधिक भीड़ है, आपकी विशेष ट्रेन किस प्रवेश द्वार और प्लेटफॉर्म से मिलेगी? क्या बड़े आयोजनों के समय स्टेशन के बाहर ही अलग-अलग ट्रेनों के यात्रियों के लिए होल्डिंग एरिया नहीं बनाए जा सकते?  मुझे लगता है हमें एक और बात समझनी होगी। भीड़ धार्मिक हो या राजनीतिक, उससे फर्क नहीं पड़ता। भगदड़ में कोई यह नहीं पूछता कि आप कुंभ में जा रहे हैं, किसी नेता की रैली में आए हैं या परीक्षा देने निकले हैं। भीड़ का अपना विज्ञान है और उसे उसी तरह समझना पड़ेगा। हम अक्सर किसी हादसे के बाद जिम्मेदार व्यक्ति तलाशने लगते हैं। यह भी जरूरी है। जिसकी गलती हो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है उस व्यवस्था की कमजोरी तलाशना जिसके कारण एक व्यक्ति की गलती भी सैकड़ों लोगों के लिए खतरा बन सकती है। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की यह रात हमें शायद यही समझाने आई थी। हम दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की बात कर रहे हैं। बुलेट ट्रेन की बात कर रहे हैं। रेलवे स्टेशनों को एयरपोर्ट जैसा बनाने की कोशिश हो रही है। नई ट्रेनें आ रही हैं, नई सड़कें और एक्सप्रेसवे बन रहे हैं। यह सब देखकर अच्छा लगता है। लेकिन विकास की असली परीक्षा चमकते स्टेशन या तेज ट्रेन से ही नहीं होगी। परीक्षा उस दिन होगी जब उसी स्टेशन पर अचानक एक लाख अतिरिक्त लोग पहुंच जाएं और वे सभी सुरक्षित अपनी ट्रेन में बैठ जाएं। हमें अब भीड़ को समस्या मानने के बजाय पहले से अनुमान लगाकर उसके लिए व्यवस्था तैयार करनी होगी। क्योंकि भीड़ तो आएगी। जब देश इतना बड़ा है तो उसकी भीड़ संभालने की व्यवस्था भी उतनी ही बड़ी और आधुनिक होनी चाहिए। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर गई 18 जिंदगियां शायद हमसे बस इतना ही सवाल पूछ रही हैं— अगली बड़ी भीड़ आने से पहले…क्या हम तैयार होंगे?

 

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