संजय शर्मा

एडिटर इन चीफ

हर साल बजट आता है। वित्त मंत्री संसद में बजट भाषण पढ़ती हैं, टीवी स्क्रीन पर आंकड़े दौड़ने लगते हैं और विशेषज्ञ यह समझाने में जुट जाते हैं कि किस सेक्टर को कितना मिला, कौन-सी चीज सस्ती होगी, कौन-सी महंगी और शेयर बाजार इस बजट को किस तरह देख रहा है।

मैं पत्रकारिता के इतने वर्षों में न जाने कितने बजट देख चुका हूं। सरकारें बदलीं, वित्त मंत्री बदले, आर्थिक नीतियां बदलीं और बजट पेश करने का तरीका भी बदल गया। कभी बजट का मतलब अगले दिन अखबार में यह देखना होता था कि पेट्रोल, सिगरेट, साबुन, टीवी या कार महंगी हुई या सस्ती। अब अर्थव्यवस्था कहीं अधिक जटिल है। टैक्स स्लैब से लेकर कैपिटल एक्सपेंडिचर, स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और गिग वर्कर तक बजट का हिस्सा हैं।

लेकिन इतने वर्षों बाद भी मेरे मन में बजट को लेकर एक बहुत साधारण सवाल रहता है—देश का बजट आखिर उस आदमी तक किस रूप में पहुंचता है, जो सुबह घर से नौकरी के लिए निकलता है, महीने की EMI भरता है, बच्चों की फीस देता है, बूढ़े माता-पिता की दवा खरीदता है और महीने के आखिरी सप्ताह में अपने बैंक खाते का बैलेंस देखकर अगले वेतन का इंतजार करता है?

1 फरवरी 2025 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2025-26 पेश किया। सरकार ने इसे विकास को गति देने और मध्यम वर्ग की खर्च करने की क्षमता बढ़ाने वाला बजट बताया। बजट का आकार बड़ा था। 2025-26 में कुल सरकारी व्यय 50.65 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान रखा गया। उधारी को छोड़कर प्राप्तियां 34.96 लाख करोड़ रुपये और राजकोषीय घाटा GDP का 4.4 प्रतिशत रखने का लक्ष्य तय किया गया। पूंजीगत खर्च के लिए 11.21 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया।

ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। लेकिन आम आदमी बजट को लाख करोड़ में नहीं समझता।

वह उसे अपनी जेब में समझता है।

और इस बजट में उसकी जेब से सीधे जुड़ी सबसे बड़ी घोषणा आयकर को लेकर थी।

नई कर व्यवस्था में 12 लाख रुपये तक की सामान्य वार्षिक आय पर टैक्स रिबेट के कारण आयकर देय नहीं रहने की घोषणा हुई। वेतनभोगी व्यक्ति के लिए 75 हजार रुपये के स्टैंडर्ड डिडक्शन को मिलाकर यह प्रभावी सीमा 12.75 लाख रुपये तक पहुंचती है। नई कर व्यवस्था में 0 से 4 लाख रुपये तक शून्य, 4 से 8 लाख पर 5 प्रतिशत, 8 से 12 लाख पर 10 प्रतिशत और उसके बाद क्रमशः बढ़ती हुई दरों का ढांचा रखा गया। सरकार का अनुमान था कि इन प्रत्यक्ष कर प्रस्तावों से करीब एक लाख करोड़ रुपये का राजस्व छोड़ा जाएगा।

निश्चित रूप से यह मध्यम वर्ग के एक बड़े हिस्से के लिए राहत थी।

जिस व्यक्ति के हाथ में हर महीने कुछ हजार रुपये अतिरिक्त बचेंगे, उसके लिए यह सिर्फ आयकर का आंकड़ा नहीं है। हो सकता है उसी पैसे से बच्चे की कोचिंग फीस निकले। किसी घर की EMI कुछ आसान हो जाए। कोई परिवार स्वास्थ्य बीमा ले सके। कोई व्यक्ति वर्षों से टालता आ रहा फ्रिज या दोपहिया वाहन खरीद ले।

अर्थव्यवस्था में यही छोटी-छोटी बचत आगे जाकर बड़ी मांग पैदा करती है।

शायद सरकार की सोच भी यही थी कि पैसा सरकारी खजाने में लेने के बजाय मध्यम वर्ग के हाथ में छोड़ा जाए ताकि वह खर्च करे, बचत करे और निवेश करे।

लेकिन यहीं एक दूसरा सवाल भी खड़ा होता है।

भारत में कितने लोग आयकर देते हैं?

और उस बहुत बड़े वर्ग का क्या, जिसकी आय इतनी ही नहीं कि वह इनकम टैक्स के दायरे में आए?

किसी छोटे शहर के होटल में काम करने वाला कर्मचारी, डिलीवरी बॉय, खेतिहर मजदूर, छोटा दुकानदार, ऑटो चालक, निजी स्कूल का कम वेतन वाला शिक्षक या असंगठित क्षेत्र में काम करने वाला करोड़ों लोगों का वर्ग बजट को टैक्स स्लैब से नहीं देखता।

वह महंगाई से देखता है।

उसके लिए सवाल है—आटा कितने का है? दाल कितने की है? गैस सिलेंडर कितने का है? बच्चे की फीस कितनी बढ़ी? अस्पताल में इलाज का खर्च कितना है? किराया कितना बढ़ा?

यही वह जगह है जहां किसी भी बजट की असली परीक्षा शुरू होती है।

सरकार ने इस बजट में विकास के चार इंजन बताए—कृषि, MSME, निवेश और निर्यात। सुनने में यह आर्थिक शब्दावली लग सकती है, लेकिन इन चारों का सीधा संबंध रोजगार और आमदनी से है। भारत जैसे देश में अगर खेती मजबूत नहीं होगी तो ग्रामीण बाजार कमजोर होगा। छोटे और मध्यम उद्योग नहीं बढ़ेंगे तो रोजगार का बड़ा आधार कमजोर होगा। निवेश नहीं आएगा तो नए उद्योग नहीं लगेंगे और निर्यात नहीं बढ़ेगा तो उत्पादन का विस्तार सीमित रहेगा। कागज पर ये बातें अच्छी लगती हैं। लेकिन मैं खेती से जुड़ी खबरों को देखते हुए हमेशा एक बात सोचता रहा हूं—हम किसान के लिए योजनाएं बहुत बनाते हैं, लेकिन किसान की सबसे बुनियादी चिंता क्या है? उसकी फसल का उचित दाम। खेती की लागत लगातार बढ़ती है। बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, मजदूरी—सबकी कीमत जुड़ती जाती है। मौसम का भरोसा अलग कम होता जा रहा है। कभी अतिवृष्टि, कभी सूखा, कभी ओलावृष्टि। किसान उत्पादन कर भी ले तो बाजार में कीमत का भरोसा नहीं। ऐसे में किसान को सिर्फ कर्ज उपलब्ध कराना समाधान नहीं हो सकता। कर्ज तभी मदद है जब खेती से इतनी आय निकले कि किसान उसे चुका सके। वरना वही कर्ज धीरे-धीरे बोझ बन जाता है।

बजट का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू MSME यानी छोटे और मध्यम उद्योगों से जुड़ा था। क्रेडिट गारंटी कवर बढ़ाने और राष्ट्रीय विनिर्माण मिशन की घोषणा की गई। इसके पीछे विचार साफ है—भारत को केवल बाजार नहीं, उत्पादन केंद्र भी बनना होगा। यह जरूरी भी है।हम अक्सर रोजगार की बात करते हैं और तुरंत सरकारी नौकरी की चर्चा शुरू हो जाती है। लेकिन कोई भी सरकार करोड़ों युवाओं को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती। असली रोजगार छोटे उद्योग, निर्माण, सेवा क्षेत्र, व्यापार और नई अर्थव्यवस्था से आएगा। भारत सरकार एक नई दिशा में आगे बढ़ रही है यह स्वागत योग्य है। इसका असर आने वाले वर्षों में हम देखेंगे।

एक और घोषणा ने मेरा ध्यान खींचा—गिग वर्कर्स का ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकरण, पहचान पत्र और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत स्वास्थ्य सुविधा। आज हमारे आसपास एक नई श्रमिक दुनिया खड़ी हो गई है। मोबाइल से खाना मंगाइए—कोई युवक मोटरसाइकिल पर लेकर आता है। ऑनलाइन सामान खरीदिए—कोई डिलीवरी करने आता है। टैक्सी ऐप खोलिए—कोई ड्राइवर सामने खड़ा होता है। हमारी डिजिटल सुविधा के पीछे लाखों लोग सड़क पर दौड़ रहे हैं। लेकिन उनकी नौकरी पारंपरिक नौकरी जैसी नहीं है। तय वेतन नहीं, नौकरी की स्थिरता नहीं, सामाजिक सुरक्षा सीमित। दुर्घटना हो जाए तो परिवार की दुनिया बदल सकती है। इसलिए गिग वर्कर्स को सरकारी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के भीतर पहचान मिलना एक महत्वपूर्ण शुरुआत है।

शिक्षा में भी बजट ने भविष्य की ओर देखने की कोशिश की। अगले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों में 50 हजार अटल टिंकरिंग लैब और शिक्षा के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर 500 करोड़ रुपये के प्रावधान की घोषणा हुई। यह जरूरी है क्योंकि दुनिया बदल रही है। लेकिन यहां भी मेरा सवाल थोड़ा अलग है। एआई  की शिक्षा अच्छी बात है, लेकिन क्या हमारे हर सरकारी स्कूल में पर्याप्त शिक्षक हैं? क्या हर बच्चे के पास ठीक कक्षा है? क्या गांव के स्कूल में इंटरनेट है? क्या प्रयोगशाला है? भारत को एआई भी चाहिए और अच्छी प्राथमिक शिक्षा भी।

स्वास्थ्य के मोर्चे पर कैंसर, दुर्लभ और गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 36 जीवनरक्षक दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी से छूट जैसी घोषणा भी महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य नीति को केवल अस्पताल बनाने की संख्या से नहीं देखना चाहिए। सवाल यह होना चाहिए कि गंभीर बीमारी आने पर किसी सामान्य परिवार को आर्थिक रूप से टूटना तो नहीं पड़ रहा? शहरों के लिए एक लाख करोड़ रुपये के फंड  की घोषणा भी हुई। शहरों को विकास केंद्र बनाने, उनके पुनर्विकास और पानी-स्वच्छता जैसी बुनियादी जरूरतों से इसे जोड़ा गया। यह घोषणा पढ़ते हुए मुझे अपने शहरों की तस्वीर याद आती है। एक तरफ चौड़ी सड़कें, मॉल, फ्लाईओवर और ऊंची इमारतें हैं। दूसरी तरफ थोड़ी बारिश होते ही पानी में डूबती कॉलोनियां हैं। ट्रैफिक में घंटों फंसे लोग हैं। पीने के पानी की समस्या है। कचरे के पहाड़ हैं।हम शहर बना रहे हैं, लेकिन क्या रहने योग्य शहर भी बना रहे हैं?

बजट 2025-26 में बहुत कुछ है। अगले वर्ष जब हम इस बजट को पलटकर देखें तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कितनी घोषणाएं हुई थीं। सवाल होना चाहिए कि कितनी जमीन पर उतरीं।

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