रायपुर : छत्तीसगढ़ के स्कूली बच्चों को अब अपनी ही माटी की कला, संस्कृति, लोकपरंपराओं और इतिहास से जुड़े पाठ पढ़ने का मौका मिलेगा। स्कूल शिक्षा विभाग कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थियों के लिए छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत पर आधारित विशेष पाठ्य और दृश्य सामग्री तैयार कर रहा है।
इसके लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), शंकर नगर रायपुर में 24 से 26 अगस्त तक तीन दिवसीय आवासीय कार्यशाला आयोजित की जा रही है। इसमें प्रदेशभर के साहित्यकार, संस्कृतिविद, विषय विशेषज्ञ, शोधकर्ता और जनसंचार विशेषज्ञ शामिल होकर करीब 100 विषयों पर सामग्री तैयार कर रहे हैं।
बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने की कोशिश
इस पहल का मकसद विद्यार्थियों को स्थानीय संस्कृति और विरासत से जोड़ना है। प्रस्तावित आर्ट रिपोजिटरी में छत्तीसगढ़ के इतिहास, कला, स्थापत्य, लोकजीवन, परंपराओं, गीत-संगीत, संतों, महापुरुषों और साहित्यकारों से जुड़ी जानकारी को आसान और रोचक तरीके से शामिल किया जाएगा।
राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद का प्रयास है कि यह सामग्री सिर्फ विद्यार्थियों तक सीमित न रहे, बल्कि शिक्षक, प्रशिक्षक, शैक्षिक प्रबंधक और पालक भी इसका उपयोग कर सकें।
100 कलाविद मिलकर तैयार करेंगे 100 विषय
कार्यशाला में प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों से पहुंचे विशेषज्ञ करीब 100 विषयों पर लेखन और मार्गदर्शन कर रहे हैं। विषयों को अलग-अलग विधाओं में बांटकर समूह बनाए गए हैं, ताकि छत्तीसगढ़ की संस्कृति के विविध रंगों को एक जगह समेटा जा सके।
संतों और महापुरुषों से लेकर लोक कलाकारों और साहित्यकारों तक को इस सामग्री में जगह दी जा रही है। गुरु घासीदास, गहिरा गुरु, शबरी माता, राजा चक्रधर, तीजन बाई, विनोद कुमार शुक्ल, माधवराव सप्रे, मिनीमाता, पं. सुंदरलाल शर्मा, वीर नारायण सिंह और गुंडाधुर जैसी विभूतियों के योगदान को भी विद्यार्थियों तक पहुंचाया जाएगा।
सिरपुर से लेकर बस्तर दशहरा तक
प्रस्तावित सामग्री में छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को भी शामिल किया जा रहा है। सिरपुर, भोरमदेव, दंतेश्वरी मंदिर, बम्लेश्वरी मंदिर, मां महामाया मंदिर रतनपुर और राजीव लोचन मंदिर राजिम जैसे स्थलों पर सामग्री तैयार की जाएगी।
इसके अलावा सतनाम पंथ, कबीर पंथ, रामनामी पंथ, घोटुल, मितान-बदना और मानस मंडली जैसी स्थानीय परंपराओं को भी पाठ्य सामग्री का हिस्सा बनाया जाएगा।
लोकनृत्य, गीत और पारंपरिक व्यंजन भी होंगे शामिल
बच्चों को छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पर्वों और उत्सवों की जानकारी भी दी जाएगी। हरेली, नवाखाई, बस्तर दशहरा, गोंचा, गौरी-गौरा, छेरछेरा, तीजा-पोला, भोजली और मड़ई जैसे पर्व इसमें शामिल होंगे।
लोकनृत्यों में पंथी, राउत नाचा, गेड़ी, ककसाड़, गौर, शैला और सुवा के साथ पंडवानी, नाचा और लोककथाओं को भी जगह मिलेगी। वहीं डोकरा कला, टेराकोटा, बांस शिल्प, लौह शिल्प, गोदना और रजवार भित्ति चित्र जैसी पारंपरिक कलाओं पर भी सामग्री तैयार की जाएगी।
इतना ही नहीं, छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खान-पान को भी बच्चों से परिचित कराया जाएगा। ठेठरी, खुरमी, फरा-मुठिया, अंगाकर रोटी, चौसेला, बफौरी और चापड़ा चटनी जैसे स्थानीय व्यंजनों को भी इस पहल में शामिल किया जा रहा है।
पाठों के साथ बनेंगी लघु फिल्मों की स्क्रिप्ट
कार्यशाला में केवल लिखित सामग्री तैयार करने पर जोर नहीं है। विद्यार्थियों के लिए प्रत्येक विषय से जुड़ी 5 से 10 मिनट की लघु फिल्मों की पटकथा भी तैयार की जाएगी, ताकि सांस्कृतिक विषयों को दृश्य माध्यम से भी आसानी से समझाया जा सके।
24 अगस्त को सामग्री का प्रस्तुतीकरण और विषयवार समीक्षा, 25 अगस्त को संशोधन और स्क्रिप्ट लेखन तथा 26 अगस्त को लघु फिल्मों की स्क्रिप्ट का अंतिम प्रस्तुतीकरण और संपादन किया जाएगा।
किताबों से आगे डिजिटल और दृश्य सामग्री पर भी जोर
प्रस्तावित आर्ट रिपोजिटरी को केवल पाठों का संग्रह नहीं माना जा रहा है। इसका उद्देश्य छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोकज्ञान और परंपराओं को विद्यार्थियों तक आधुनिक और रोचक तरीके से पहुंचाना है।
इस पहल से नई पीढ़ी अपनी स्थानीय विरासत को जानने के साथ उसके संरक्षण और संवर्धन से भी जुड़ सकेगी। स्कूल की पढ़ाई में स्थानीय संस्कृति को शामिल करने का यह प्रयास छत्तीसगढ़ की पहचान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।