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  • धान के पारंपरिक चक्र से बाहर निकलकर वैज्ञानिक तकनीक अपनाई, अब हर महीने हो रही बंपर कमाई

रायपुर, छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में कृषि के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। धान की पारंपरिक खेती के ढर्रे को छोड़कर आधुनिक और वैज्ञानिक पद्धतियों से सब्जी उत्पादन करने पर किसानों की तकदीर बदल रही है। बैंगन और लौकी जैसी फसलों की उन्नत किस्मों, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) के उपयोग से उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की जा रही है।

गुणवत्तापूर्ण उपज के कारण बाजार में किसानों को बेहतर दाम मिल रहे हैं, जिससे शुद्ध लाभ कई गुना बढ़ गया है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, आधुनिक तकनीकों के सही इस्तेमाल से किसान प्रति एकड़ 3 से 5 लाख रुपये तक का शुद्ध लाभ आसानी से कमा सकते हैं।

पारंपरिक ढर्रे से हटकर चुनी नई राह

नारायणपुर विकासखंड के सुदूर ग्राम नेतानार के रहने वाले किसान वासुदेव शिवलाल भी कभी आम किसानों की तरह सिर्फ पारंपरिक धान की खेती पर निर्भर थे। कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें साल में केवल एक ही फसल मिल पाती थी।

सीमित आमदनी के कारण परिवार की जरूरतें बमुश्किल पूरी होती थीं और भविष्य को लेकर हमेशा अनिश्चितता बनी रहती थी। हालांकि, वासुदेव के मन में कुछ नया करने और अपनी माली हालत सुधारने का गहरा जज्बा था।

उद्यानिकी विभाग का मार्गदर्शन और जीवन का ‘यू-टर्न’

वासुदेव के जीवन में असली बदलाव तब आया जब उन्होंने जिला उद्यानिकी विभाग से संपर्क किया। विभाग के अधिकारियों ने उन्हें पारंपरिक धान की खेती का दायरा घटाकर नगदी फसलों (सब्जी उत्पादन) की ओर कदम बढ़ाने की सलाह दी।

पानी की बचत और फसलों की सही सिंचाई के लिए उन्हें ड्रिप सिंचाई प्रणाली (टपक सिंचाई) अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। तकनीकी बारीकियों को समझने के बाद वासुदेव ने साहसिक निर्णय लिया और अपने 1 हेक्टेयर खेत में सब्जी उत्पादन की नींव रखी।

कम पानी में बंपर पैदावार और लागत में कमी

उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन में वासुदेव ने वैज्ञानिक तरीके से बैंगन और लौकी की खेती शुरू की। ड्रिप सिंचाई प्रणाली के उपयोग से फसलों में क्रांतिकारी बदलाव आया:

  • पानी और पोषक तत्वों की बचत: पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचने से पानी का अपव्यय रुका।

  • खरपतवार और बीमारियों में कमी: खेत में अनावश्यक नमी न रहने से खरपतवार और कीटों का प्रकोप काफी कम हो गया।

  • लागत में भारी गिरावट: दवाओं और खाद के विवेकपूर्ण उपयोग तथा मजदूरी खर्च में कमी आने से लागत घट गई।

  • उत्कृष्ट गुणवत्ता: चमक, आकार और स्वाद में बेहतर होने के कारण उनकी उपज को बाजार में प्राथमिकता मिलने लगी।

नियमित आय से मजबूत हुई आर्थिक स्थिति

आज वासुदेव के खेत की ताजी सब्जियां नारायणपुर के स्थानीय बाजारों के साथ-साथ आसपास के मंडियों में भी हाथों-हाथ बिक रही हैं। जहाँ पहले उन्हें पूरे साल में केवल एक बार धान बेचने पर ही एकमुश्त राशि मिलती थी, वहीं अब सब्जी उत्पादन से उन्हें हर हफ्ते नियमित आय प्राप्त हो रही है।

अपनी इस सफलता से वासुदेव न केवल अपने परिवार की सभी आवश्यकताओं को सहर्ष पूरा कर रहे हैं, बल्कि भविष्य के लिए बचत भी कर रहे हैं। खेती अब उनके लिए घाटे का सौदा नहीं, बल्कि एक बेहद मुनाफेदार व्यवसाय बन चुकी है।

 पूरे क्षेत्र के लिए बने ‘रोल मॉडल’

ग्राम नेतानार में वासुदेव के हरे-भरे खेत और उनकी आर्थिक समृद्धि को देखकर आसपास के दर्जनों आदिवासी और स्थानीय किसान भी बेहद प्रभावित हैं। उन्हें देखकर क्षेत्र के अन्य किसान भी अब पारंपरिक खेती छोड़कर आधुनिक कृषि तकनीकों, ड्रिप सिंचाई और वैज्ञानिक सब्जी उत्पादन को अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं।

वासुदेव शिवलाल की यह सफलता इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि सही सरकारी मार्गदर्शन, आधुनिक तकनीक और किसान की लगन का मेल हो जाए, तो बस्तर की भूमि पर भी समृद्धि की नई गाथा लिखी जा सकती है। उनकी यह कहानी प्रदेश के लाखों किसानों के लिए ‘समृद्ध किसान, समृद्ध राज्य’ के सपने को साकार करने का सशक्त माध्यम बनी है।

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