रायपुर, बच्चों में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता, जिज्ञासा, रचनात्मक सोच और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के उद्देश्य से रायपुर में विद्यालयीन शिक्षकों के लिए दो दिवसीय ‘कहानीकार’ कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। 6 और 7 अक्टूबर को आयोजित इस कार्यशाला में कला, कहानी और स्थानीय अनुभवों को शिक्षण से जोड़कर बच्चों को प्रकृति और पर्यावरण को समझने के लिए प्रेरित करने पर जोर दिया जा रहा है।
आईआईएसईआर पुणे के केयर प्रोजेक्ट, समग्र शिक्षा छत्तीसगढ़, यूनिसेफ और छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर के संयुक्त सहयोग से आयोजित कार्यशाला की थीम ‘आर्ट ऐज स्टोरी, स्टोरी ऐज नॉलेज, नॉलेज ऐज एक्शन’ रखी गई है। इसमें प्रदेश के विभिन्न जिलों के शासकीय विद्यालयों के शिक्षक हिस्सा ले रहे हैं। उद्घाटन अवसर पर छत्तीसगढ़ साइंस सेंटर के महानिदेशक पी. कवीश्वर ने कहा कि कहानी बच्चों को जानकारी देने के साथ अपने आसपास की दुनिया को देखने, समझने और उस पर स्वतंत्र रूप से विचार करने के लिए प्रेरित करने का प्रभावी माध्यम है।
कार्यशाला के दौरान बच्चों के लिए तैयार भारत के पहले द्विभाषी हिंदी-अंग्रेजी क्लाइमेट टैब्लॉइड ‘जुगनू’ का विमोचन भी किया गया। आईआईएसईआर पुणे के केयर प्रोजेक्ट के एक्शन रिसर्च के माध्यम से विकसित ‘जुगनू’ का उद्देश्य बच्चों को जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण जैसे विषयों को सहज एवं रचनात्मक तरीके से समझने और अपनी बात व्यक्त करने का मंच उपलब्ध कराना है। इसमें स्थानीय परिवेश, प्रकृति, पर्यावरण और जलवायु से जुड़े बच्चों एवं शिक्षकों के अनुभवों और विचारों को स्थान दिया जाएगा।
केयर प्रोजेक्ट की प्रोजेक्ट लीड और ‘जुगनू’ की पब्लिशर डॉ. शालिनी शर्मा ने बताया कि इसका उद्देश्य बच्चों में जलवायु परिवर्तन को लेकर केवल चिंता पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने आसपास के पर्यावरण को समझने, सवाल पूछने, अपनी आवाज रखने और सकारात्मक बदलाव के लिए पहल करने के लिए प्रेरित करना है। ‘इको-एंग्जायटी’ को ‘इको-एजेंसी’ में बदलने की सोच के साथ यह पहल बच्चों को पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करेगी।
छत्तीसगढ़ रीजनल साइंस सेंटर की सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर प्रज्ञा कदम ने कहा कि कहानी बच्चों के विचारों, संवेदनाओं और दृष्टिकोण को विकसित करने का सशक्त माध्यम है। बचपन से बच्चों को प्रकृति और पर्यावरण से जोड़ने पर उनमें संरक्षण की भावना स्वाभाविक रूप से विकसित हो सकती है। उन्होंने कहा कि पर्यावरणीय संवेदनशीलता को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रखने के बजाय बच्चों के दैनिक जीवन और संस्कार का हिस्सा बनाने की जरूरत है।
दो दिवसीय कार्यशाला में कला, कहानी और स्थानीय जलवायु अनुभवों पर आधारित गतिविधिपरक सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। शिक्षक अपने स्थानीय परिवेश, प्रकृति, समुदाय और पर्यावरण से जुड़े अनुभवों को कहानी एवं कला के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं। कार्यशाला में सीखे गए रचनात्मक शिक्षण तरीकों का उपयोग कक्षा में विद्यार्थियों को अवलोकन, सवाल पूछने, विचार करने, अनुभव साझा करने और समाधान तलाशने के लिए प्रेरित करने में किया जा सकेगा।