शिरीष कहते हैं कि अक्सर इतिहास और साहित्य में बड़ी नदियों और उन नदियों के तट पर विकसित नगरीय सभ्यता पर तो खूब चर्चा होती है, पर कहीं-न-कहीं किसी छोटी नदी और उसकी गोद में किसी गांव की संस्कृति हाशिये पर ही छूट जाती है. ऐसे में ‘नदी सिंदूरी’ की गोद में आकार लेती मदनपुर जैसे एक गांव की उपस्थिति को परिधि में लाया गया है.