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Sushasan Tihar 2026

छत्तीसगढ़ में चल रहा सुशासन तिहार अब ग्रामीण किसानों के लिए राहत और भरोसे का बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। गांव-गांव आयोजित हो रहे जनसमस्या निवारण शिविरों में न सिर्फ लोगों की शिकायतों का समाधान हो रहा है, बल्कि पात्र हितग्राहियों को योजनाओं का लाभ भी मौके पर ही मिल रहा है। अंबिकापुर विकासखंड के ग्राम पंचायत पम्पापुर निवासी किसान मौसम दास की कहानी इसी बदलते प्रशासनिक तंत्र की तस्वीर पेश करती है।
मौसम दास बताते हैं कि उनके पिता अमरदास लंबे समय से खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं। परिवार को हर सीजन में निजी दुकानों से महंगे दाम पर खाद खरीदना पड़ता था। खुले बाजार में खाद और कृषि सामग्री की कीमत ज्यादा होने से खेती की लागत लगातार बढ़ रही थी। इसका सीधा असर उत्पादन और परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा था। खेती के लिए जरूरी संसाधन समय पर नहीं मिलने से उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था। ऐसे में किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा उनके लिए बड़ी जरूरत बन चुकी थी।
सुशासन तिहार के तहत आयोजित जनसमस्या निवारण शिविर में मौसम दास ने सहकारी समिति और खाद विभाग के माध्यम से आवेदन किया। प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनका किसान क्रेडिट कार्ड बन गया। कार्ड मिलने के बाद मौसम दास और उनके परिवार में नई उम्मीद जगी है। उन्होंने बताया कि अब उन्हें सहकारी समिति के माध्यम से समय पर खाद और कृषि सामग्री उपलब्ध हो सकेगी। इससे खेती की लागत कम होगी और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। उनका मानना है कि पहले संसाधनों की कमी के कारण खेती पूरी क्षमता से नहीं हो पा रही थी, लेकिन अब हालात बेहतर होंगे।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में चल रहे सुशासन तिहार का उद्देश्य सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे ग्रामीणों तक पहुंचाना है। इसी कड़ी में अधिकारी और विभागीय कर्मचारी गांवों में शिविर लगाकर लोगों की समस्याएं सुन रहे हैं और मौके पर समाधान भी कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में किसान क्रेडिट कार्ड, ऋण पुस्तिका, नामांतरण और अन्य राजस्व मामलों के त्वरित निराकरण से किसानों में भरोसा बढ़ा है। मौसम दास ने भी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और जिला प्रशासन के प्रति आभार जताते हुए कहा कि सुशासन तिहार के कारण अब गांव के किसानों को योजनाओं का सीधा लाभ मिलने लगा है।
सुशासन तिहार के जरिए प्रशासनिक व्यवस्था की नई तस्वीर सामने आ रही है, जहां लोग दफ्तरों के चक्कर लगाने के बजाय अपने गांव में ही समाधान पा रहे हैं। सरकारी योजनाएं अब कागजों से निकलकर खेतों तक पहुंचने लगी हैं।

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