रायपुर : छत्तीसगढ़ ने भूजल संरक्षण के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। भूजल संसाधन आकलन-2026 के मुताबिक प्रदेश का अब एक भी विकासखंड भूजल दोहन की ‘क्रिटिकल’ श्रेणी में नहीं है। वर्ष 2020 में जहां 9 विकासखंड इस श्रेणी में थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर 5 रह गई थी। अब 2026 के आकलन में ये पांचों विकासखंड भी क्रिटिकल श्रेणी से बाहर आ गए हैं।
भूजल की स्थिति में सुधार का यह प्रदेश का अब तक का सबसे बड़ा एक-चक्रीय सुधार बताया जा रहा है। इस आकलन में 12 विकासखंडों की श्रेणी में सुधार हुआ है, जबकि किसी भी विकासखंड की स्थिति खराब नहीं हुई। इसके साथ ही सुरक्षित श्रेणी वाले विकासखंडों की संख्या बढ़कर 127 हो गई है।
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड और राज्य भूजल सर्वेक्षण मंडल की ओर से तैयार भूजल संसाधन आकलन-2026 को राज्य स्तरीय भूजल आकलन एवं प्रबंधन समिति ने मंजूरी दी है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘जन शक्ति से जल शक्ति’ के आह्वान और ‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान ने जल संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा दी है। उन्होंने कहा कि सरकार के साथ किसानों, जिला प्रशासन, मैदानी अमले और आम नागरिकों की भागीदारी से जल संरक्षण अब जन आंदोलन का रूप ले चुका है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि सिर्फ सरकारी योजनाओं का नतीजा नहीं है, बल्कि खेतों और गांवों में हुए बदलाव का परिणाम है। उन्होंने बेमेतरा और राजनांदगांव समेत प्रदेश के उन किसानों को इसका श्रेय दिया, जिन्होंने पानी की बचत के लिए अपनी खेती के तौर-तरीकों में बदलाव किया। मैदानी अमले ने भी किसानों के साथ लगातार काम किया, जिसका असर भूजल की स्थिति में दिखाई दे रहा है।
भूजल रिचार्ज ने बनाया नया रिकॉर्ड
आकलन के मुताबिक छत्तीसगढ़ में वार्षिक भूजल रिचार्ज बढ़कर 14.65 बिलियन घन मीटर (BCM) पहुंच गया है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। वर्ष 2017 में यह आंकड़ा 11.57 BCM था।
तालाबों, पोखरों और अन्य जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण व पुनर्जीवन से भूजल रिचार्ज में बड़ा सुधार हुआ है। वर्ष 2020 की तुलना में तालाबों और पोखरों से होने वाले भूजल रिचार्ज में 266.9 प्रतिशत और अन्य जल संरक्षण संरचनाओं से होने वाले रिचार्ज में 202.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
वर्ष 2026 के आकलन में प्रदेशभर में कुल 2 लाख 28 हजार 736 जल संरचनाएं दर्ज की गई हैं। ‘जल संचय जन भागीदारी’ और ‘कैच द रेन’ अभियान के तहत बनी और पुनर्जीवित की गई संरचनाओं ने इसमें अहम भूमिका निभाई है।
भूजल दोहन में भी पहली बार आई गिरावट
इस बार के आकलन की खास बात यह है कि भूजल रिचार्ज बढ़ने के साथ-साथ भूजल दोहन में भी कमी आई है। वर्ष 2026 में प्रदेश में कुल भूजल दोहन 6.21 BCM दर्ज किया गया, जबकि पिछले आकलन में यह 6.30 BCM था। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक भूजल दोहन में यह पहली वार्षिक गिरावट है।
वर्ष 2022 में प्रदेश में भूजल दोहन का स्तर 49.5 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जो अब घटकर 46.37 प्रतिशत रह गया है। यह 70 प्रतिशत की सुरक्षित सीमा से काफी नीचे है।
बेमेतरा और राजनांदगांव में फसल पैटर्न बदलने का असर
भूजल दोहन कम होने में फसल विविधीकरण को भी महत्वपूर्ण वजह माना जा रहा है। खासकर बेमेतरा और राजनांदगांव में किसानों ने गर्मी के धान का रकबा कम किया है।
बेमेतरा में गर्मी के धान का रकबा करीब 26 हजार हेक्टेयर से घटकर 5 हजार हेक्टेयर रह गया है। वहीं राजनांदगांव में यह रकबा 9,400 हेक्टेयर से घटकर करीब 2,800 हेक्टेयर हो गया। दोनों जिलों को मिलाकर गर्मी के धान के रकबे में करीब 27,600 हेक्टेयर की कमी आई है।
इसका असर भूजल दोहन पर भी पड़ा है। बेमेतरा लगातार चार आकलन चक्रों के बाद क्रिटिकल श्रेणी से बाहर आया है। जिले में वर्ष 2023 की तुलना में कुल भूजल दोहन करीब 20 प्रतिशत कम हुआ है। राजनांदगांव में भी स्थिति सुधरी है। वर्ष 2022 में यहां भूजल दोहन 70.5 प्रतिशत तक पहुंच गया था, जो अब सुरक्षित श्रेणी में आ गया है। यहां सिंचाई के लिए भूजल दोहन में वर्ष 2023 की तुलना में 16.4 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
अब 19 अर्ध-संकटग्रस्त विकासखंडों पर फोकस
प्रदेश में क्रिटिकल विकासखंडों की संख्या भले ही शून्य हो गई है, लेकिन सरकार अब अर्ध-संकटग्रस्त क्षेत्रों पर फोकस करने की तैयारी में है। फिलहाल 11 जिलों के 19 विकासखंड अर्ध-संकटग्रस्त श्रेणी में हैं।
मुख्यमंत्री ने वर्ष 2030 तक प्रदेश के किसी भी विकासखंड को भूजल तनावग्रस्त नहीं रहने देने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज, फसल विविधीकरण और जनभागीदारी को आगे बढ़ाया जाएगा।
वर्ष 2026-27 में बेमेतरा, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा जिलों के करीब 5,442 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में NAQUIM 2.0 के तहत जलभृत मानचित्रण अध्ययन प्रस्तावित है। इससे अलग-अलग क्षेत्रों में भूजल की उपलब्धता और जलभृतों की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन करने में मदद मिलेगी।
सरकार के मुताबिक यह सुधार किसी एक विभाग के प्रयास का नतीजा नहीं है। जल संसाधन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, कृषि, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी और जिला प्रशासन समेत विभिन्न विभागों ने मिलकर जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और किसानों को कम पानी वाली फसलों के लिए प्रोत्साहित करने पर काम किया है।
अब सरकार ‘कैच द रेन’ योजना 2026-27 को विकासखंड स्तर के मासिक लक्ष्यों के साथ आगे बढ़ाने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री साय ने कहा कि जनभागीदारी के दम पर क्रिटिकल विकासखंडों की संख्या शून्य तक पहुंची है और इसी सामूहिक प्रयास से वर्ष 2030 तक प्रदेश के सभी विकासखंडों को भूजल की दृष्टि से सुरक्षित बनाने का लक्ष्य हासिल किया जाएगा।