पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम ने केवल ममता बनर्जी की हार नहीं दिखाई, बल्कि उस पूरी राजनीतिक शैली को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है, जिसमें सत्ता को जनसेवा के बजाय भय, दबाव और तुष्टीकरण के औजार की तरह इस्तेमाल किया जाता रहा। चुनाव के बाद ममता बनर्जी और उनके नेताओं की भाषा, धमकियों के स्वर और उसके बाद सामने आई हिंसा की खबरों ने देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि बंगाल में लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित था या सचमुच जनता को स्वतंत्र रूप से जीने और बोलने का अधिकार भी था।
ममता बनर्जी आज फिर वही पुराना राग दोहरा रही हैं कि वोट चोरी हो गया। लेकिन जिन लोगों ने चुनाव, मतदान और मतगणना की प्रक्रिया को करीब से देखा है, वे जानते हैं कि बंगाल में इस बार चुनाव आयोग की व्यवस्था अभूतपूर्व रूप से सख्त और पारदर्शी थी। कई स्तरों पर निगरानी, ऑब्जर्वर, सुरक्षा बल और कैमरों की मौजूदगी ने यह सुनिश्चित किया कि बूथ कैप्चरिंग और डराकर वोट डलवाने की पुरानी शैली पर रोक लगे। दरअसल, तकलीफ इसी बात की है कि इस बार जनता को डराकर चुप कराने वाली व्यवस्था काम नहीं कर पाई।
बंगाल में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के विरुद्ध जो जनभावना बनी, वह केवल चुनावी हार-जीत का मामला नहीं है। यह उस सत्ता-अहंकार के विरुद्ध जनता की प्रतिक्रिया है, जिसमें विरोधी को प्रतिद्वंद्वी नहीं, दुश्मन समझा जाता है। लोकतंत्र में हार के बाद पराजित पक्ष से अपेक्षा होती है कि वह जनादेश स्वीकार करे, कार्यकर्ताओं को संयम का संदेश दे और सत्ता-परिवर्तन को शांतिपूर्ण बनाए। लेकिन बंगाल में इसके उलट भाषा, हिंसा और धमकी का माहौल दिखाई दिया। राजनीति में तीखापन चल सकता है, लेकिन जब भाषा वोटर, कार्यकर्ता और विरोधी को डराने जैसी लगे, तब वह लोकतंत्र की मर्यादा से बाहर चली जाती है।
ममता बनर्जी केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी पर सवाल उठा रही थीं। वे आरोप लगा रही थीं कि सुरक्षा बल जनता को डरा रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि सुरक्षा बलों की तैनाती उन्हीं तत्वों को रोकने के लिए थी जो बूथ कैप्चरिंग, धमकी और राजनीतिक हिंसा के जरिए चुनाव को प्रभावित करते रहे। बंगाल की जनता ने पहली बार अपेक्षाकृत सुरक्षित माहौल में बोलना शुरू किया। लोगों ने खुलकर बताया कि किस तरह वोटिंग पर दबाव बनाया जाता था, किस तरह विरोधी कार्यकर्ताओं को डराया जाता था और किस तरह सत्ता का स्थानीय नेटवर्क लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में रखता था।
ऐसे समय में देश के विपक्ष को जनता के जनादेश के साथ खड़ा दिखना चाहिए था। उसे कहना चाहिए था कि किसी भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता पर हमला स्वीकार्य नहीं है, किसी भी नागरिक को वोट देने के कारण डराया नहीं जा सकता और कानून का शासन सर्वोपरि है। लेकिन विपक्ष ने इसके बजाय ममता बनर्जी और उनके परिवारवादी नेतृत्व के साथ खड़े होकर एकजुटता दिखाने की कोशिश की। यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल है। विपक्ष शायद यह भूल रहा है कि जनता अब केवल भाषण नहीं सुनती, वह दृश्य भी देखती है। वह देखती है कि कौन पीड़ित नागरिक के साथ खड़ा है और कौन पराजित सत्ता के अहंकार के साथ।
विपक्ष का यह रवैया ऐसा दिखता है मानो वह देश की बहुसंख्यक आबादी को चुनौती दे रहा हो—तुम वोट देकर सरकार बदल दो, हम फिर भी तुम्हारी पसंद के विरुद्ध खड़े रहेंगे। यही भाव विपक्ष के लिए घातक है। यदि बंगाल के गांवों, गलियों और कस्बों में लोग परिवर्तन को राहत की तरह देख रहे हैं, यदि समाज का बड़ा हिस्सा वर्षों से भय, पक्षपात और तुष्टीकरण की राजनीति से आहत था, तो विपक्ष को उस जनभावना को समझना चाहिए। बहुसंख्यक समाज की पीड़ा को बार-बार “राजनीतिक नैरेटिव” कहकर खारिज करना अब राष्ट्रीय राजनीति में संभव नहीं है।
बंगाल की जनता ने देखा कि कैसे टीएमसी नेताओं की भाषा लगातार आक्रामक होती गई। वोटरों को धमकाने जैसी भाषा, भाजपा कार्यकर्ताओं को सबक सिखाने जैसे संकेत, और अभिषेक बनर्जी का केंद्रीय गृहमंत्री तक को चुनौती देने वाला स्वर—इन सबने जनता के भीतर पहले से जमा आक्रोश को और तीखा किया। सत्ता जब विनम्रता खो देती है, तो जनता उसे सबक सिखाती है। बंगाल में वही हुआ।
टीएमसी के नेताओं के बयान दरअसल जनता के उन आरोपों को मजबूत करते रहे कि बंगाल में निष्पक्ष चुनाव लंबे समय से कठिन होता जा रहा था। ऊपर से हिंदू समाज के भीतर यह धारणा भी गहरी हुई कि उनके धार्मिक आयोजनों, पर्वों और सांस्कृतिक भावनाओं को बार-बार शासन की रोक-टोक का सामना करना पड़ा, जबकि एक वर्ग के तुष्टिकरण पर पूरी राजनीति टिकी रही। यही भाव धीरे-धीरे एक बड़े सामाजिक प्रतिरोध में बदला। जब समाज एक साथ खड़ा होता है, तो सत्ता की सबसे मजबूत दीवारें भी गिर जाती हैं।
आज ममता बनर्जी के साथ खड़े होकर विपक्ष केवल एक पराजित नेता का समर्थन नहीं कर रहा, वह बंगाल के उस मतदाता के विरुद्ध खड़ा दिखाई दे रहा है जिसने भय और तुष्टीकरण की राजनीति को अस्वीकार किया है। विपक्ष को यदि सत्ता चाहिए, तो उसे बहुसंख्यक समाज के फैसले को स्वीकारते हुए दिखना चाहिए, न कि ममता बनर्जी के साथ खड़े होकर उसी समाज को चिढ़ाना चाहिए। राजनीति में गठबंधन आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन जनता की भावना से बड़ा कोई गठबंधन नहीं होता।
यहाँ छत्तीसगढ़ का शुरुआती दौर याद करना जरूरी है। जब छत्तीसगढ़ नया राज्य बना था, तब जनता के भीतर नई आशाएँ थीं। लेकिन प्रारंभिक शासनकाल में राजनीतिक हत्याओं, सत्ता के अहंकार और भय के वातावरण ने जनमानस पर गहरा असर डाला। जनता ने देखा कि सत्ता के आसपास कैसा माहौल बन रहा है। परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन सत्तारूढ़ दल कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता से बाहर रही। पंद्रह वर्षों तक जनता ने उसे वापस नहीं आने दिया। यह केवल चुनावी गणित नहीं था, यह जनता की स्मृति थी। जनता सब देखती है, सब याद रखती है और सही समय आने पर निर्णय देती है।
बंगाल में भी विपक्ष को यही समझना चाहिए। यदि किसी राज्य की जनता किसी शासन को भय, हिंसा, पक्षपात और तुष्टीकरण से जोड़कर देखने लगे, तो उस शासन के साथ खड़े होने का अर्थ केवल एक नेता का समर्थन नहीं रह जाता। वह जनता की पीड़ा की अनदेखी बन जाता है। यही छवि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष के लिए भारी नुकसानदेह सिद्ध हो सकती है।
आज देश का बहुसंख्यक समाज पहले से अधिक सजग है। वह देख रहा है कि कौन उसकी धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता का सम्मान करता है और कौन उसे केवल वोट-बैंक के गणित में देखता है। किसी समुदाय का संरक्षण और राजनीतिक तुष्टीकरण दो अलग बातें हैं। कानून सबके लिए समान होना चाहिए। यदि किसी सरकार की छवि ऐसी बनती है कि वह एक वर्ग को राजनीतिक कारणों से विशेष संरक्षण देती है और दूसरे वर्ग की पीड़ा को अनदेखा करती है, तो अंततः वही छवि उसके विरुद्ध जनलहर बन जाती है।
ममता बनर्जी की राजनीति के साथ विपक्ष की एकजुटता इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि यह विपक्ष को परिवर्तन-विरोधी, जनादेश-विरोधी और बहुसंख्यक समाज की भावना से कटे हुए समूह के रूप में प्रस्तुत करती है। विपक्ष यदि सत्ता में लौटना चाहता है, तो उसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि भारत की राजनीति अब केवल जातीय समीकरणों, गठबंधन गणित और वोट-बैंक के सहारे नहीं चलेगी। उसे समाज की वास्तविक भावनाओं, सांस्कृतिक चेतना और कानून-व्यवस्था की अपेक्षा को समझना होगा।
बंगाल का संदेश साफ है। जनता भय की राजनीति को बहुत दिनों तक सहन कर सकती है, लेकिन हमेशा नहीं। जनता तुष्टीकरण को लंबे समय तक देख सकती है, लेकिन अंततः उसका उत्तर देती है। जनता नेताओं की भाषा, उनके संकेत और उनके साथ खड़े होने वालों को याद रखती है। यदि विपक्ष इस समय भी ममता बनर्जी के साथ खड़े होकर बंगाल के जनादेश को चुनौती देने जैसा दृश्य बनाता है, तो वह अपने लिए भविष्य की पराजय का रास्ता स्वयं तैयार करेगा। राजनीति में हार-जीत सामान्य है, लेकिन जनता के निर्णय के विरुद्ध खड़े होने की कीमत बहुत भारी होती है। छत्तीसगढ़ ने यह देखा है। बंगाल इसका नया उदाहरण बन सकता है। और यदि विपक्ष ने अब भी सबक नहीं लिया, तो बंगाल की यह राजनीतिक आग केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहेगी; वह पूरे देश में विपक्ष की विश्वसनीयता को झुलसा सकती है।