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बस्तर जिले के गिरोला गांव में स्थित हिंगलाज माता का मंदिर न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश में एक विशेष स्थान रखता है. इस मंदिर की कहानी भारत के विभाजन से जुड़ी हुई है, जो इसे आस्था के साथ-साथ इतिहास का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है.

देश के बंटवारे से पहले, हिंगलाज माता का मूल शक्तिपीठ बलूचिस्तान के हिंगोल पर्वत पर स्थित था. विभाजन के बाद, बस्तर के लोगों ने अपनी आराध्य देवी को वहां से लाकर गिरोला में स्थापित किया. गिरोला में विराजमान हिंगलाज माई बस्तर के कई गांवों में पूजी जाती हैं और यहां के निवासियों के जीवन का अभिन्न अंग हैं.

हिंगलाज माता की महिमा केवल हिंदू धर्म तक ही सीमित नहीं है. यह भी माना जाता है कि पाकिस्तान के मुसलमान भी हिंगलाज माता की पूजा करते हैं, जो इस देवी के सर्वधर्म समभाव के प्रतीक को दर्शाता है. बस्तर के अलावा, राजस्थान और ओडिशा के लोग भी हिंगलाज माता को अपनी आराध्य देवी मानते हैं, जिससे उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है.

बस्तर में हिंगलाज माता के मंदिरों की संख्या इस क्षेत्र में उनकी गहरी आस्था का प्रमाण है. यह माना जाता है कि भक्तों ने बस्तर के जुगानीकलार, बेड़ाउमरगांव और बेड़ागांव होते हुए गिरोला पहुंचकर एक कच्चे मकान में हिंगलाज माई की प्रतिमा स्थापित की थी. इसके बाद बेड़ागांव समेत बस्तर में लगभग 250 जगहों पर हिंगलाज माई के मंदिर बनाए गए. देवी के प्रति बस्तर और ओड़िशा के लोगों की आस्था का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जितने मंदिर हिंगलाज माता के हैं, उतने दंतेश्वरी माई के भी नहीं हैं.

ओडिशा, जो छत्तीसगढ़ का सीमावर्ती प्रांत है, वहां भी कई जगहों पर माता के मंदिर बने हुए हैं, जहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है. नवरात्रि के दौरान, गिरोला गांव में विशेष रूप से दर्शनार्थियों की भीड़ होती है. बस्तर में रहने वाले सिंध प्रांत के लोगों की भी माता के प्रति गहरी आस्था है और वे हर साल नवरात्रि में बड़ी संख्या में दर्शन करने गिरोला गांव पहुंचते हैं.

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