संजय शर्मा

एडिटर इन चीफ

 

हाल ही में मार्च 2025 में संसद ने आपदा प्रबंधन कानून में महत्वपूर्ण बदलाव किए। डिजास्टर मैनेजमेंट संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी 29 मार्च 2025 को मिली और इसके प्रावधान 9 अप्रैल 2025 से लागू हो गए हैं। 2004 की सुनामी ने भारत को यह समझाया था कि आपदा केवल राज्य या जिले की प्रशासनिक समस्या नहीं है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर की संस्थागत व्यवस्था चाहिए। इसी के बाद एनडीआरएफ और एसडीआरएफ जैसे संगठन अस्तित्व में आए।

बारिश कुछ घंटे ज्यादा हो जाए और शहर की सड़कें नदी बन जाएं। पहाड़ पर बादल फटे और कुछ मिनटों में बस्तियां बह जाएं। गर्मी ऐसी पड़े कि लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जाए। किसी इमारत में आग लगे और बाद में पता चले कि फायर एग्जिट बंद था। हमारे यहां ऐसी आपदाओं  के बाद एक दृश्य लगभग तय है। सायरन बजाती गाड़ियां। राहत और बचाव दल। अस्पताल। नेताओं और अधिकारियों के दौरे। मृतकों के लिए मुआवजे की घोषणा। जांच समिति। कुछ दिनों तक टीवी पर बहस। फिर धीरे-धीरे जिंदगी सामान्य होने लगती है और हम अगली आपदा तक लगभग सब भूल जाते हैं।

पत्रकारिता के इतने वर्षों में मैंने एक बात बार-बार महसूस की है—हम आपदा से लड़ने में जितनी ऊर्जा लगाते हैं, उससे बहुत कम ऊर्जा आपदा आने से पहले उसके खतरे को कम करने में लगाते हैं।शायद यही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। बीस साल बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं।अब खतरा केवल बाढ़, भूकंप या चक्रवात नहीं है। जलवायु परिवर्तन ने आपदा का चरित्र बदल दिया है।

ऐसी जगहों पर अत्यधिक बारिश हो रही है जहां पहले उसका इतिहास नहीं था। शहरों में गर्मी बढ़ रही पहाड़ी क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण, जंगलों में आग, शहरी बाढ़ और भूस्खलन नए खतरे पैदा कर रहे हैं।2025 के कानून के संशोधन में एक महत्वपूर्ण बात जोड़ी गई नए खतरे जो भविष्य में अत्यधिक जलवायु परिवर्तन जैसी घटनाओं या अन्य कारणों से पैदा हो सकते हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण NDMA को देश के पर खतरे का समय-समय पर आकलन करने और बदलते खतरों के बारे में दिशानिर्देश देने की जिम्मेदारी दी गई। इसका मतलब है कि सरकार को यह इंतजार नहीं करना चाहिए कि पहले शहर डूबे, फिर पता लगाया जाए कि पानी क्यों भरा। पहले पता लगाइए कि कौन-सी कॉलोनी बाढ़ के खतरे में है। कौन-सा नाला बंद है। कौन-सी इमारत भूकंप में असुरक्षित है।

यानी आपदा प्रबंधन को राहत और बचाव से आगे बढ़ाकर जोखिम कम करने की व्यवस्था बनाना है।

नया कानून आपदा को प्राकृतिक घटना नहीं बल्कि जीवन, संपत्ति, बुनियादी ढांचे, आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था और पर्यावरण को संभावित नुकसान के रूप में देखता है।यह सोच महत्वपूर्ण है।  प्रकृति खतरा पैदा कर सकती है, लेकिन कई बार उसे आपदा में बदलने का काम हमारी योजना और लापरवाही करती है। 2025 के बदलाव का दूसरा बड़ा पहलू है राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर डिजास्टर डाटा बेस बनाने की व्यवस्था।

इस डेटाबेस में आपदा का आकलन, फंड का आवंटन और खर्च, तैयारी और योजना तथा अलग-अलग प्रकार के खतरों का आंकलन शामिल किया जाना है। पहली नजर में डेटाबेस शब्द बहुत तकनीकी लगता है। लेकिन जरा सोचिए। किसी जिले में पिछले बीस वर्षों में कितनी बार बाढ़ आई? कौन-से गांव हर बार प्रभावित हुए? कितना पैसा राहत में खर्च हुआ? कितने मकान टूटे? कौन-सी सड़क हर तीसरे साल बह जाती है?  किस जगह पर आग की घटनाएं बार-बार हो रही हैं? अगर ये सारी जानकारी एक जगह उपलब्ध है तो प्रशासन अगली घटना से पहले तैयारी कर सकता है।

और अगर जानकारी सार्वजनिक और पारदर्शी हो तो नागरिक भी सवाल पूछ सकता है—पिछली बाढ़ के बाद जिस नाले को चौड़ा करने के लिए पैसा आया था, वह काम हुआ या नहीं?

यहां एक चिंता भी है। भारत में योजनाओं और कानूनों की कमी नहीं है। डेटा की भी कमी हमेशा नहीं होती। समस्या कई बार यह होती है कि उपलब्ध जानकारी निर्णय में बदलती नहीं। फाइल में खतरा दर्ज रहता है और जमीन पर निर्माण जारी रहता है। रिपोर्ट कहती है कि क्षेत्र बाढ़ प्रभावित है और वहां नई कॉलोनी की अनुमति मिल जाती है। डेटा तभी उपयोगी है जब उसके आधार पर कठिन फैसले लेने की राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो।

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