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छत्तीसगढ़ के रायपुर में पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूरचंद कुलिशजी के जन्म शताब्दी वर्ष के मौके पर शहर में स्त्री देह से आगे…विषय पर संवाद कार्यक्रम में पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि स्त्री को खुद को ‘शरीर’ नहीं, बल्कि आत्मा का रूप समझना होगा। मां की भूमिका इतनी बड़ी है कि देवता भी नहीं समझ पाते।

वह प्राण का पोषण करती है, सिर्फ शरीर का नहीं। उसके भीतर वो दिव्यता है, जिसे पुरुष समझ ही नहीं सकता। भारतीय संस्कृति की विशिष्टता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ भारत ऐसा देश है जहां आत्माओं का रिश्ता ‘सात जन्मों’ का माना जाता है। यहां विवाह सिर्फ दो शरीरों का नहीं, दो आत्माओं का मिलन है। इसलिए मां बनना, बहू बनना, स्त्री बनना… ये कोई साधारण भूमिकाएं नहीं हैं।
सवाल: आज के दौर में महिलाओं की भूमिका दोहरी हो गई है, तो बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए वे क्या कर सकती हैं? 

कोठारी : बच्चे मां-बाप को किताब की तरह पढ़ते हैं। आप उन्हें कुछ कहें, जरूरी नहीं कि वे मानें, लेकिन आप जो करते हैं, वे उसकी नकल ज़रूर करते हैं। इसलिए आप चाहते हैं कि बच्चे किसी आदत से बचें, तो खुद वैसा व्यवहार न करें। आज की शिक्षा केवल कॅरियर और पैकेज सिखा रही है, लेकिन इंसान नहीं बना रही। हमें सोचना होगा कि जिन रास्तों पर पुरानी पीढ़ियां चलीं, क्या वे वास्तव में सुखी थीं? अगर नहीं, तो फिर उन्हीं राहों पर क्यों चलना?

सवाल: स्त्री भ्रूण हत्या में समाज स्त्री शक्ति को ही नष्ट कर रहा है। मां की क्या भूमिका हो सकती है? 

कोठारी: हमें समझना होगा कि मां साधारण शब्द नहीं है। मां सृष्टि की मूल शक्ति है। सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा सभी उसी के रूप हैं। अगर समाज में बलात्कार हो रहे हैं, तो उस पुरुष को पैदा करने वाली मां को आत्ममंथन करना होगा। मां अपने बच्चे में वही मूल्य डाले, जिससे वह किसी की इज्जत लेने वाला नहीं, इज्जत देने वाला बने।

सवाल: समय के साथ बहुत कुछ बदला, लेकिन पुरुष की मानसिकता अभी भी वही है। स्त्री को बराबरी कैसे मिलेगी? 

कोठारी: स्त्री बराबरी क्यों तलाश रही है? वह तो हजार गुना बड़ी है। पुरुष में अहंकार हो सकता है, लेकिन स्त्री में शक्ति है। मां बनना शरीर का काम नहीं, आत्मा की भूमिका है। पिता के साथ तीन पीढ़ियों के निर्माण में मां, पत्नी और दादी-नानी की भूमिका सबसे ज़्यादा होती है।

सवाल: समाज पहनावे को लेकर लड़कियों को निशाना बनाता है, लड़कों के नजरिए को बदलने की जरूरत क्यों नहीं समझी जाती? 

कोठारी: दृष्टिकोण का निर्माण भी मां करती है, चाहे लड़का हो या लड़की। शरीर को स्त्री-पुरुष मान लेना ही भ्रम की जड़ है। वस्त्र और आभूषण कार्य और परिस्थिति के अनुसार होने चाहिए। इसमें वैज्ञानिकता है। आभूषण और वस्त्र शौक नहीं, शरीर की आवश्यकता के अनुसार होने चाहिए।

सवाल: महिलाएं जब दूसरे घर जाती हैं तो उन्हें कई बार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, उन्हें क्या करना चाहिए? 

कोठारी: हर घर की परिस्थिति अलग होती है। वहां निर्णय भी परिस्थिति अनुसार लेना होगा। निर्माण तप से होता है, साहस से होता है। स्त्री को अपने भीतर की शक्ति को पहचानना होगा और परिस्थितियों से लड़ने का साहस दिखाना होगा।

सवाल: बच्चे स्कूल जाते हैं, लेकिन उनके सोचने का तरीका बिगड़ता जा रहा है। बाहर की दुनिया से वे क्या सीखते हैं? 

कोठारी: बच्चे आज सबसे बड़ी तकलीफ इसी बात की झेल रहे हैं कि उनके मां-बाप उनके साथ बैठकर बात नहीं करते। एक घंटा रोज़ निकालिए, उनके पास बैठिए, बात कीजिए, बिना मोबाइल उठाए। उन्हें महसूस कराइए कि वे अकेले नहीं हैं। आज वे इंटरनेट से जवाब खोजते हैं, क्योंकि हम उन्हें समय नहीं दे रहे। बच्चे सवालों से भरे हुए हैं। हमें उनके साथ ईमानदारी से बैठना होगा,एक संकल्प के साथ। पिता से भी पांच कदम आगे बढ़कर ज्ञान देना आज मां की भूमिका होनी चाहिए।

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