व्याकरण किसी भी भाषा की प्राण होती है। इसके बिना समृद्ध भाषा की परिकल्पना नहीं की जा सकती। इस तथ्य को नजरअंदाज कर प्रदेश के जिम्मेदार अफसरों ने स्कूल के हिंदी के पाठ्यक्रमों से व्याकरण को ही विलोपित कर दिया। इससे आहत सेवानिवृत्त शिक्षक ने न सिर्फ सरकारी दफ्तरों से लेकर न्यायालय तक सात साल संघर्ष किया, बल्कि व्याकरण को पाठ्यक्रम में पुन:स्थापित करवाने में भी सफलता हासिल की है।
हर साल पत्र और आश्वासन का चलता रहा दौर
इस दौरान माध्यमिक शिक्षा मंडल के वर्ष 2018 के कक्षा नवमीं से बारहवीं तक के पाठ्यक्रमों से व्याकरण वाले हिस्से को विलोपित कर दिया गया। इस पर उन्होंने एससीईआरटी के संचालक सहित तमाम जिम्मेदार अफसरों से पत्र व्यवहार किया। संचालक ने वर्ष 2019 के पाठ्यक्रमों में विलोपित हिस्से को जोडऩे का भरोसा दिलाया, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। हर साल पत्र और आश्वासन का दौर चलता रहा। अंतत: उन्होंने वर्ष 2021 में इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका लगाई।
द्वितीय अवमानना की चेतावनी पर जागे
सेवानिवृत्त शिक्षक चंद्राकर ने बताया कि अवमानना याचिका के बाद भी आगामी सत्र में व्याकरण पाठ्यक्रमों में नहीं जोड़ा गया। इस पर उन्होंने क्षेत्रीय विधायक ललित चंद्राकर से संपर्क किया। चंद्राकर की पहल पर सामाजिक कार्यकर्ता अमरचंद सुराना की सलाह पर संबंधित अफसरों को द्वितीय अवमानना याचिका का नोटिस भेजा। इसके बाद अफसर हरकत में आए और पाठ्यचर्या समिति की बैठक में पाठ्यक्रम में हटाए गए हिस्से को जोड़ने का फैसला किया।
अब अशुद्धियों को दूर कराने की इच्छा
उम्र के 84वें वर्ष को पार करने के करीब सेवानिवृत्त शिक्षक पुरानिक लाल चंद्राकर मात्र इसी सफलता से संतुष्ट नहीं हैं, वे अब पाठ्यक्रमों में अशुद्धियों को दूर कराने की मुहिम में जुटने की इच्छा रखते हैं। उनका कहना है कि स्कूलों के हिन्दी व संस्कृत दोनों के पाठ्यक्रमों में भाषा की सैकड़ों गंभीर अशुद्धियां हैं। जिन्हें उन्होंने चिन्हित कर रखा है। कई जगहों पर इसे लेकर पत्र व्यवहार भी किया है, लेकिन अभी इनमें सुधार नहीं हो पाया है। वे इसे दूर कराना चाहते हैं।
मिट गई मानसिक व शारीरिक थकान
CG News: पाठ्यक्रमों में व्याकरण को फिर से जोड़ने के फैसले से उत्साहित सेवानिवृत्त शिक्षक पुरानिक लाल चंद्राकर कहते हैं कि लंबे संघर्ष और संबंधित अफसरों की बेरूखी से निराशा होने लगी थी, लेकिन इस सफलता से मानसिक और शारीरिक सभी थकान दूर हो गई है। उनका कहना है कि व्याकरण नहीं पढ़ाए जाने से हिंदी को अपूरणीय क्षति होती। इससे हिंदी प्राणहीन हो जाती। इस फैसले से हिंदी को प्राणहीन कर बोली बनाने के कुचक्र से मुक्ति मिली है।